Tuesday, October 27, 2009



कलश में लौटी कमाई की राख
उन्होंने अपनी सारी पूंजी को इन्वेस्ट कर बेटों को विदेश में कमाई करने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि विदेश में की गई कमाई उनकी सात पुश्तों तक के दुख-दर्द दूर कर देगी। उनके बेटे लौटे तो, लेकिन सिर्फ कलश भर अस्थियों के रूप में। अपने बेटों के लौटने के बाद जिन खुशगवार पलों को जीने के सपने संजोए थे, वे चकनाचूर भी हो गए। उसी के बिखरे टुकड़े अब उनकी आंखों में चुभते हैं। फरीदकोट जिले के गांव मचाकी कलां के दो परिवारों ने अपने बेटों को विदेश में खो दिया और आखिरी समय में उनकी एक झलक भी न पा सके। विदेश में मौत का शिकार हुए बच्चों को याद कर बूढ़ी आंखें अपने बाकी बचे परिवार के पालन-पोषण का जुगाड़ करने में शून्य में ताकती रहती हैं। गुरमीत कौर के पति की मौत काफी पहले ही हो गई थी। उसने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर कड़ी मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण किया। इस दौरान बड़े बेटे जसप्रीत सिंह ने विदेश जाने की ठानी तो गुरमीत ने अपनी चार एकड़ जमीन गिरवी रखकर बेटे को मनीला भेज दिया। स्थायी काम हासिल करने के लिए जसप्रीत ने वहां एक अनिवासी पंजाबी लड़की खुशवीर से शादी रचा ली। बीवी के हाथों की मेंहदी अभी अपने यौवन पर थी कि वहां कुछ लुटेरों ने जसप्रीत को गोलियों से छलनी कर दिया। बेटे की मौत के बाद गांव में मानो परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने बच्चे की लाश को अपनी धरती पर लाकर अंतिम संस्कार कर सकें। कुछ ही दिन बाद उसकी बहू हाथ में अस्थि कलश लिए एक विधवा के रूप में उनके सामने आ खड़ी हुई। अब यह परिवार अपनी गिरवी जमीन बचाने के लिए घर में रखी भैंसों का दूध बेचकर काम चला रहा है। इस काम में जसप्रीत का छोटा भाई जी जान से जुटा हुआ है। ऐसा ही कुछ हाल है इसी गांव के जसविंदर कौर के परिवार का। उसका बेटा भी पैसा कमाने विदेश गया था। उसे विदेश भेजने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी। पैसे कम पड़े तो ब्याज पर पैसा उठा लिया। उसको उम्मीद थी कि बेटे को विदेश में काम मिलते ही सारा कर्ज एक ही झटके में उतर जाएगा। तकदीर को यह मंजूर नहीं था। जसपाल सिंह भी मनीला ही गया था। कुछ समय वहां काम करने के बाद किसी बीमारी से उसकी मौत हो गई। कई दिनों की मेहनत के बाद परिवार को अपने बेटे की लाश का मुंह देखना नसीब हुआ। बेटे की निशानी के तौर पर इस परिवार के पास उसका भेजा एक टेलीविजन सेट और डीवीडी प्लेयर ही हैं। जसविंदर का परिवार अब एक कच्चे मकान में दिन काट रहा है।

कलश में लौटी कमाई की राख
उन्होंने अपनी सारी पूंजी को इन्वेस्ट कर बेटों को विदेश में कमाई करने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि विदेश में की गई कमाई उनकी सात पुश्तों तक के दुख-दर्द दूर कर देगी। उनके बेटे लौटे तो, लेकिन सिर्फ कलश भर अस्थियों के रूप में। अपने बेटों के लौटने के बाद जिन खुशगवार पलों को जीने के सपने संजोए थे, वे चकनाचूर भी हो गए। उसी के बिखरे टुकड़े अब उनकी आंखों में चुभते हैं। फरीदकोट जिले के गांव मचाकी कलां के दो परिवारों ने अपने बेटों को विदेश में खो दिया और आखिरी समय में उनकी एक झलक भी न पा सके। विदेश में मौत का शिकार हुए बच्चों को याद कर बूढ़ी आंखें अपने बाकी बचे परिवार के पालन-पोषण का जुगाड़ करने में शून्य में ताकती रहती हैं। गुरमीत कौर के पति की मौत काफी पहले ही हो गई थी। उसने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर कड़ी मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण किया। इस दौरान बड़े बेटे जसप्रीत सिंह ने विदेश जाने की ठानी तो गुरमीत ने अपनी चार एकड़ जमीन गिरवी रखकर बेटे को मनीला भेज दिया। स्थायी काम हासिल करने के लिए जसप्रीत ने वहां एक अनिवासी पंजाबी लड़की खुशवीर से शादी रचा ली। बीवी के हाथों की मेंहदी अभी अपने यौवन पर थी कि वहां कुछ लुटेरों ने जसप्रीत को गोलियों से छलनी कर दिया। बेटे की मौत के बाद गांव में मानो परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने बच्चे की लाश को अपनी धरती पर लाकर अंतिम संस्कार कर सकें। कुछ ही दिन बाद उसकी बहू हाथ में अस्थि कलश लिए एक विधवा के रूप में उनके सामने आ खड़ी हुई। अब यह परिवार अपनी गिरवी जमीन बचाने के लिए घर में रखी भैंसों का दूध बेचकर काम चला रहा है। इस काम में जसप्रीत का छोटा भाई जी जान से जुटा हुआ है। ऐसा ही कुछ हाल है इसी गांव के जसविंदर कौर के परिवार का। उसका बेटा भी पैसा कमाने विदेश गया था। उसे विदेश भेजने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी। पैसे कम पड़े तो ब्याज पर पैसा उठा लिया। उसको उम्मीद थी कि बेटे को विदेश में काम मिलते ही सारा कर्ज एक ही झटके में उतर जाएगा। तकदीर को यह मंजूर नहीं था। जसपाल सिंह भी मनीला ही गया था। कुछ समय वहां काम करने के बाद किसी बीमारी से उसकी मौत हो गई। कई दिनों की मेहनत के बाद परिवार को अपने बेटे की लाश का मुंह देखना नसीब हुआ। बेटे की निशानी के तौर पर इस परिवार के पास उसका भेजा एक टेलीविजन सेट और डीवीडी प्लेयर ही हैं। जसविंदर का परिवार अब एक कच्चे मकान में दिन काट रहा है।

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