Friday, October 30, 2009


चीते को बसाने पर मचा बवाल
जयराम रमेश की परियोजना पर बाघ विशेषज्ञ उठाने लगे हैं सवालअफ्रीकी चीते के लिए भारत में नहीं है घास के मैदाननई दिल्ली। क्योटो प्रोटोकॉल को लेकर विवाद में आए केंद्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश की चीता परियोजना पर भी बवाल मचने लगा है। बाघ विशेषज्ञों ने यह कहकर एतराज जताना शुरू कर दिया है कि अफ्रीकी चीते के लिए भारत में घास के मैदान नहीं हैं, ऐसे में यह चीता कहां दौड़ेगा। उल्लेखनीय है कि भारत में चीता पांचवे दशक की शुरुआत में लुप्त हो गया था। बाघ विशेषज्ञों के तेवरों से साफ है कि मामला प्रधानमंत्री दरबार में पहुंच सकता है। हालांकि अभी देहरादून स्थित वन्यजीव संस्थान इस परियोजना का अध्ययन कर रहा है।किसान फिर चीते को जिंदा नहीं छोड़ेंगे इसकी रिपोर्ट के बाद ही मामला आगे बढ़ेगा। लेकिन बाघ विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि खुद पर्यावरण व वन मंत्रालय में भी इस योजना की सफलता पर आशंका जताई जा रही है। राष्ट्रीय टाइगर संरक्षण प्राधिकरण की पिछले दिनों हुई बैठक में भी ज्यादातर सदस्यों ने इस परियोजना पर सवाल खड़े कर दिए। प्राधिकरण की सदस्य व सांसद मेनका गांधी ने से कहा कि चीते को भारत लाना बेहद बड़ी गलती होगी। उन्होंने इसके कई कारण भी गिनाए। एक तो अफ्रीकी चीता घास के मैदानों में रहता है, जंगलों में नहीं। यहां घास के बड़े मैदान नहीं हैं। ऐसे में यह चीता खेतों में दौड़ने लगेगा। इससे फसल चौपट होगी और किसान फिर चीते को जिंदा नहीं छोड़ेंगे।कम से कम एक दर्जन चीता लाने होंगेइसके अलावा चीते को आबाद करने के लिए कम से कम एक दर्जन चीता लाने होंगे। इतने ज्यादा चीते भला कौन देगा। चीता परिवार के भाई-बहन कभी भी आपस में परिवार नहीं बसाते। लेकिन यहां एक ही परिवार से पैदा बच्चों में बीमारियों का ज्यादा खतरा रहेगा। इससे उनकी संख्या भी नहीं बढ़ पाएगी। फिर एक ही रास्ता बचेगा कि चीता को चिड़ियाघर में डाल देना पड़ेगा।कहां पाया जाता है चीताचीता खुली जगह, छोटा मैदान, अर्द्घ-शुष्क क्षेत्र जहां शिकार उपलब्ध हो, वहां पाया जाता है। एशियाई चीते ईरान के कवीर रेगिस्तानी क्षेत्र के अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भी पाए जाते हैं। 90 के दशक तक ईरान में चीतों की संख्या 200 से अधिक थी, लेकिन अब 50 से 100 के बीच है।क्या है चीता परियोजनालगभग छह दशक पहले भारत ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के जंगलों से गायब हो चुके चीते को दोबारा आबाद करने की मुहिम जयराम रमेश ने छेड़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अफ्रीकी चीता यहां के जंगलों में बसाया जा सकता है। क्योंकि दोनों महाद्‌वीपों के चीतों में जेनेटिक तौर पर अंतर नहीं है।
चीते को बसाने पर मचा बवाल
जयराम रमेश की परियोजना पर बाघ विशेषज्ञ उठाने लगे हैं सवालअफ्रीकी चीते के लिए भारत में नहीं है घास के मैदाननई दिल्ली। क्योटो प्रोटोकॉल को लेकर विवाद में आए केंद्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश की चीता परियोजना पर भी बवाल मचने लगा है। बाघ विशेषज्ञों ने यह कहकर एतराज जताना शुरू कर दिया है कि अफ्रीकी चीते के लिए भारत में घास के मैदान नहीं हैं, ऐसे में यह चीता कहां दौड़ेगा। उल्लेखनीय है कि भारत में चीता पांचवे दशक की शुरुआत में लुप्त हो गया था। बाघ विशेषज्ञों के तेवरों से साफ है कि मामला प्रधानमंत्री दरबार में पहुंच सकता है। हालांकि अभी देहरादून स्थित वन्यजीव संस्थान इस परियोजना का अध्ययन कर रहा है।किसान फिर चीते को जिंदा नहीं छोड़ेंगे इसकी रिपोर्ट के बाद ही मामला आगे बढ़ेगा। लेकिन बाघ विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि खुद पर्यावरण व वन मंत्रालय में भी इस योजना की सफलता पर आशंका जताई जा रही है। राष्ट्रीय टाइगर संरक्षण प्राधिकरण की पिछले दिनों हुई बैठक में भी ज्यादातर सदस्यों ने इस परियोजना पर सवाल खड़े कर दिए। प्राधिकरण की सदस्य व सांसद मेनका गांधी ने से कहा कि चीते को भारत लाना बेहद बड़ी गलती होगी। उन्होंने इसके कई कारण भी गिनाए। एक तो अफ्रीकी चीता घास के मैदानों में रहता है, जंगलों में नहीं। यहां घास के बड़े मैदान नहीं हैं। ऐसे में यह चीता खेतों में दौड़ने लगेगा। इससे फसल चौपट होगी और किसान फिर चीते को जिंदा नहीं छोड़ेंगे।कम से कम एक दर्जन चीता लाने होंगेइसके अलावा चीते को आबाद करने के लिए कम से कम एक दर्जन चीता लाने होंगे। इतने ज्यादा चीते भला कौन देगा। चीता परिवार के भाई-बहन कभी भी आपस में परिवार नहीं बसाते। लेकिन यहां एक ही परिवार से पैदा बच्चों में बीमारियों का ज्यादा खतरा रहेगा। इससे उनकी संख्या भी नहीं बढ़ पाएगी। फिर एक ही रास्ता बचेगा कि चीता को चिड़ियाघर में डाल देना पड़ेगा।कहां पाया जाता है चीताचीता खुली जगह, छोटा मैदान, अर्द्घ-शुष्क क्षेत्र जहां शिकार उपलब्ध हो, वहां पाया जाता है। एशियाई चीते ईरान के कवीर रेगिस्तानी क्षेत्र के अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भी पाए जाते हैं। 90 के दशक तक ईरान में चीतों की संख्या 200 से अधिक थी, लेकिन अब 50 से 100 के बीच है।क्या है चीता परियोजनालगभग छह दशक पहले भारत ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के जंगलों से गायब हो चुके चीते को दोबारा आबाद करने की मुहिम जयराम रमेश ने छेड़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अफ्रीकी चीता यहां के जंगलों में बसाया जा सकता है। क्योंकि दोनों महाद्‌वीपों के चीतों में जेनेटिक तौर पर अंतर नहीं है।

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